“ऐ ज़िंदगी”…

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ऐ ज़िंदगी तू रूठकर मुझसे अब कहीं जाना नहीं ।
जीने के लिए जान मुझसा कोई दीवाना नहीं ।
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बड़ी शिद्दत से मुस्कुराने की वज़ह ढूँढ रहा हूँ ,
गुज़ारिश है नज़र इक पल के लिए भी हटाना नहीं ।
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अब चाहे आँधी आ जाये या फिर कोई तूफान ,
मैं तेरे साथ हूँ , तू बेवज़ह तो घबराना नहीं ।
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हो अगर दिली ख़्वाहिश आसमां में जाकर उड़ने की ,
सफल होगे , कदम दो-चार चलकर डगमगाना नहीं ।
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रिश्तों की आज़माईश कदम-कदम ज़रूरी नहीं है ?
हो चुका हूँ तेरा , बार-बार अब आज़माना नहीं ।
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सबसे खास गुरू बस तू ही है ऐ ज़िंदगी आजकल ,
बहुत कुछ सिखा जाती है , भले कुछ भी बताना नहीं ।
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चेहरा खिला रहेगा इस “कृष्णा” का हमेशा यहाँ ,
सोचना , समझना मगर साथ देकर इतराना नहीं ।
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— °•K. S. PATEL•°
( 05/09/2018 )

         

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