तन्हा बैठें तो ख़ुद से गुफ़्तगू कीजे

++ग़ज़ल++(१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ )
कभी तन्हा अगर बैठें तो ख़ुद से गुफ़्तगू कीजे
खुदा मौजूद जो अंदर उसी की जुस्तजू कीजे
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नुज़ूमी क्या बताएगा हमारी चाल क़िस्मत की
पढ़ा किसने मुक़द्दर है भला क्या आरजू कीजे
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हमारी जान और पहचान से आगे बढ़ा दो गाम
ज़रा अब ‘आप’ को ‘तुम’ कर फिर उसको जल्द ‘तू’ कीजे
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कहाँ तक नफ़रतों का ज़ुल्म सहते जायेंगे यारों
मुहब्बत की शरर से रोशनी अब चार सू कीजे
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तभी करना मुहब्बत गर निभा पाओ सभी क़समें
नहीं हो इसकी रुसवाई हमेशा सुर्खरू कीजे
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कभी भागें नहीं आफ़ात से मुश्किल मुसीबत में
मुक़ाबिल हों लड़ें ख़ुद को ग़मों के रूबरू कीजे
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बने पहचान आदम की सलामत है अगर इज़्ज़त
किसी सूरत नहीं नीलाम अपनी आबरू कीजे
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ख़ुशी रक्खे क़दम इस बार घर में रोक लेना सब
‘तुरंत’ अच्छा यही अब है ख़ुशी को पालतू कीजे
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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