“कमाल कहते हो”…

नैनों से नैन मिलाने को कमाल कहते हो ।
फिर लरजते अश्क़ बहाने को कमाल कहते हो ।
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दिल आखिर दिल है , कोई किराये का घर नहीं ,
औ हर बार आज़माने को कमाल कहते हो ।
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ज़माने भर का कटाक्ष सच में कम था क्या यार ,
जो बेवज़ह मुस्कुराने को कमाल कहते हो ।
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घरेलू हिंसा के अनगिनत निशां नज़र न आते ,
औ एक बार ये मनाने को कमाल कहते हो ।
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किसी विधवा का घर एक बार बसाओ तो जानें ,
सात फेरे बस लगाने को कमाल कहते हो ।
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कल शादी के लिये लड़की कहाँ से लाओगे ,
आज कन्या-भ्रूण गिराने को कमाल कहते हो ।
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सीखने पर ध्यान बहुत कम है “कृष्णा” पर फिर भी ,
गलती में आँख दिखाने को कमाल कहते हो ।
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