“कर ली है क़याम उम्र”…

°°°
यूँ ही गुजरता रहा ये वक़्त , बेवज़ह हुई बदनाम उम्र ।
क्या खोया-क्या पाया , उलझती रही इसमें सरे-आम उम्र ।
••
अनगिनत चाहतों का सिलसिला मन से बाहर आता रहा ,
ख़्वाहिशों के सहारे , हमेशा कटती रही तमाम उम्र ।
••
कल होगा बेहतर , इस विचार ने ठीक से सोने न दिया ,
जगाये रखी हरदम और तलाशती रही नेक काम उम्र ।
••
सोच की गहराई को भी नापने का वक़्त ही कहाँ मिला ?
तन के लिबास को देखकर , लगाती रही हरदम दाम उम्र ।
••
न जाने कौन समझदार समझ पाएगा इस जी का हाल ?
सब अपने में ही व्यस्त हैं , फिर क्या दे कोई ईनाम उम्र ?
••
मुसीबतों में आहों की फ़रमाइश दिखने लगे जब कभी ,
कभी-कभी लगता रहा , कैसी जगह कर ली है क़याम * उम्र ?
••
बिगड़ते सेहत ने भी माहौल यहाँ ख़राब कर रखा है ,
देखना है कब तलक ये ज़िंदगी को करती है सलाम उम्र ?
••
हर दौर से गुजरकर जीवन से फासला बढ़ता रहा ,
जीने की प्यास बढ़ी मगर घटती जा रही तेज़ ग़ाम * उम्र ।
••
हिम्मत है तो दुनिया से बग़ावत करके देख लो “कृष्णा”,
दुनिया में कर रखी है सरफिरों के लिए अच्छी इंतज़ाम उम्र ।
°°°
* क़याम = निवास
* ग़ाम = कदम
°°°
— °•K.S. PATEL•°
( 20/02/2019 )

         

Share: