कलियों को खिलने भी नहीं देते हैं

ख्वाबे मन्जिल से वो मिलने भी नहीं देते हैं |
रोशनी चाहते जलने भी नहीं देते हैं |
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कोई आराम करे भी तो करे कैसे अब,
दिन तमन्नाओं का वो ढलने भी नहीं देते हैं |
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इल्म महनत का सिखाते हैं सभी को लेकिन,
अपने बच्चों को टहलने भी नहीं देते हैं |
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बात फूलों को बचाने की करे कौन यहाँ,
अबतो कलियों को वो खिलने भी नहीं देते हैं |
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वो पसीने में हैं तर चैन की खातिर लेकिन,
बर्फ हसरत की पिघलने भी नहीं देते हैं |
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यूँ रुलाते हैं हमें आज ‘मनुज’ वो देखो,
अश्क आँखों से निकलने भी नहीं देते हैं |

         

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