कल नही होता आज सा

न रहा वो जलवा चराग़ का ।
न रहा वो हुस्न शराब सा ।
था सिकन्दर कभी कोई ,
हुआ अब वो क़िताब का ।
डूब कर चाँद मगरिब में ,
न रहा अब आफ़ताब सा ।
दमका था सूरज आसमाँ पर,
साँझ हुआ अँधेरों के साथ सा ।
हरता है क्यों “निश्चल” तू ,
कल नही होता आज सा ।
….. विवेक दुबे”निश्चल”@…

         

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