“कुछ बहना हुआ”…

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गरमी के मौसम में यूं बूंदों का बरसना हुआ ।
मानो ग़म में फ़िज़ा की आँखों से कुछ बहना हुआ ।
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हवा में खुलने लगी है पुड़िया स्वार्थ की ,
जिस गली देखो उधर हर किसी का बहकना हुआ ।
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ये कैसा बचपना है जहाँ कोई बालपन नहीं ?
प्रतिस्पर्धा के दौरां मासूमियत का हटना हुआ ।
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ये मौसम के तेवर सब अमीरों के चोंचलें हैं ,
घर से निकलता गरीब तो चूल्हे का जलना हुआ ।
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इधर आह पे गुजरती तो उधर वाह पे गुजरती ,
हर बीते पल वादे कुचलने का दुर्घटना हुआ ।
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जीवन-दर्शन की चाह में ज्यादा भक्ति ठीक नहीं ,
कथनी-करनी से हर बाबाओं का निकलना हुआ ।
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रिश्तेदारों के यहाँ जाना अभी मुश्किल है ,
अज़ीब शक्लें देख “कृष्णा” रिश्तों का छुपना हुआ ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 01/05/2018 )

         

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