“कैसे-कैसे”…

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कुछ गलतफ़हमियाँ हैं और ग़ुमाँ कैसे-कैसे ?
सब भूल जाते ख़ुद के दरमियाँ कैसे-कैसे ?
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फ़ितरत सबकी अलग है , एक-सी होती कहाँ ?
जिस तरह बदलता रंग आसमाँ कैसे-कैसे ?
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आफ़शाए-राज़-इश्क़ * में दिल थामकर रखना ,
हाये ! हलक पे आ जाती है जाँ कैसे-कैसे ?
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न सिर न पैर फिर भी झूठ कहने से न परहेज़ ,
ये बनाकर रखे हैं लोग ज़ुबाँ कैसे-कैसे ?
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बसे छोटे दिल वाले इस शहर में ज्यादातर ,
आलीशान भले हैं मगर मकाँ कैसे-कैसे ?
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आगे बढ़ो मगर सुनो तो कसलो-रंज़े-राह *,
असफलता पर मिले अक्सर बयाँ कैसे-कैसे ?
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करम अच्छे हों और ख़ुदग़र्ज़ी पर लगे बंदिश ,
सूरमाओं के मिटे यहाँ निशाँ कैसे-कैसे ?
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जो मेरे यार को देख ले , हूक-सी उठे इक ,
ज़हान में असफल ज़ब्ते-फ़ुंगाँ * कैसे-कैसे ?
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ख़ुद को तलाश न पाये , कोई तुझे तलाशता ,
“कृष्णा” तेरे भी हैं मेहरबाँ कैसे-कैसे ?
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* आफ़शाए-राज़-इश्क़ = प्रीत का रहस्य खोलने पर
* कसलो-रंजे-राह = मार्ग की कठिनाइयों का वर्णन
* ज़ब्ते-फ़ुंगाँ = आह न करने का प्रयास
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— °•K.S. PATEL•°
( 12/05/2018 )

         

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