कौन दुश्मन और जहाँ में कौन अब हमदर्द है

++ग़ज़ल ++(2122 2122 2122 212)
कौन दुश्मन और जहाँ में कौन अब हमदर्द है
जुस्तज़ू* में रात दिन इसकी ही औरत-मर्द है (*तलाश )
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भीड़ रिश्तों की रफ़ीक़ों की रक़ीबों की मगर
आदमी दुनिया में अक़्सर फिर भी रहता फ़र्द* है (*अकेला )
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हम जिधर भी हाथ डालें मिल रहा धोका फ़रेब
हो गया अब ये ज़माना इतना क्यों बेदर्द है
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मौसमों का और बशर का आजकल यकसाँ मिज़ाज
सर्दियों में भी नहीं होता ये क्यों अब सर्द है
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ज़श्न का मौका मिले तो छोड़ना बिलकुल नहीं
ज़िंदगी में पल ख़ुशी के कम, ज़ियादा दर्द है
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इस क़दर है फ़िक़्र-ओ-ग़म से अब परेशाँ आदमी
रुख़ हर इक अब जिस तरफ़ देखें उधर ही ज़र्द* है(*पीला )
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क्या सिखाते हैं सबक़ हम नस्ले-नौ* को आजकल (*नई पीढ़ी )
बन रहा ये नौजवाँ क्यों आज दहशतगर्द है
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ज़ुल्म होता देख कर क्यों उठती आवाजेँ नहीं
मुल्क का हर मर्द अब क्या हो गया नामर्द है
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ज़ुर्म करते तो समझ लीजै ‘तुरंत इस बात को
सब गुनाहों की ख़ुदा रखता हमेशा फ़र्द* है (*रजिस्टर )
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी
19 /10 /2018
*बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ
अरकान -फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

         

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