क्या क्या सितम हुए न मेरी ज़िंदगी के साथ

++ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 )
क्या क्या सितम हुए न मेरी ज़िंदगी के साथ
ग़म ढोये बेशुमार ज़रा सी ख़ुशी के साथ
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चाहत है ज़िंदगी में समुन्दर की आपको
चल पड़िए आप फिर किसी बहती नदी के साथ
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आएगी काम नेकियाँ गर आप कर सकें
दामन न जोड़िये कभी अपना बदी के साथ
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तालीम का बढ़ाइये कुछ दायरा जनाब
वर्ना चलेंगे कैसे हम अगली सदी के साथ
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कैसा भी हो नशा नहीं है फ़ायदा कोई
डूबे हैं राजपाट कई मयकशी के साथ
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मिलता है कुछ न कुछ ज़रा नुस्ख़ा तो आजमा
हाथो को जोड़ सर झुका दे बन्दगी के साथ
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हाथों में बागडोर सफ़ाई की लें हुज़ूर
जीना पड़ेगा वरना हमें गंदगी के साथ
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अस्मत के क़ातिलों को सज़ा दीजिये कड़ी
कब तक जियेगी कौम यूँ शर्मिंदगी के साथ
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कामिल जहाँ में कोई नहीं आदमी ‘तुरंत ‘
अपना बनाइये उसे उसकी कमी के साथ
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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