गाँव और परदेस

मैं अपना गांव सजाने में मस्त रहता था
ख़ुशी के फूल खिलाने में मस्त रहता था

मैं आके गांव से परदेस में बहुत रोया
वहां तो हँसने हंसाने में मस्त रहता था

यहां तो खींच के लाई है मुझको मजबूरी
नहीं तो फ़िक्र-ए-ज़माने में मस्त रहता था

यहां तो लाज ख़ुद अपनी बचे है मुश्किल से
वहां सभी की बचाने में मस्त रहता था

समझ में आया यहां क़ीमती है हर लम्हा
वहां में वक़्त बिताने में मस्त रहता था

हुआ जो दूर तो ममता भी याद आई साद
वहां तो माँ को सताने में मस्त रहता था

अरशद साद रूदैलवी

         

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