गाता है

अकेलेपन से घबराए तो वो चिल्ला के गाता है।
सभी हों सामने तो फिर बहुत शरमा के गाता है।

बहुत दिन तक छुपाया अब मगर बतला के गाता है,
वो शायर है ग़ज़ल में दर्द ओ ग़म ला ला के गाता है।

सुनो चुपचाप तो फिर फ़र्ज़ अदा करता है महफ़िल में,
अगर तारीफ़ कर दो फिर तो वो इतरा के गाता है।

निभाता है सभी घर की वो ज़िम्मेदारियाँ अपनी,
कराना चुप हो बच्चों को तो वो तुतला के गाता है।

हक़ीक़त में नहीं आता मगर मुझको सताने को,
दबे पाँवो वो अक्सर ख़ाब में आ आ के गाता है।

फ़रेबी है उसे मालूम हैं कमज़ोरियाँ मेरी,
मुहब्बत के हसीं मंज़र मुझे दिखला के गाता है।
©️®️ मंजुल मंज़र लखनवी

         

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