गज़ल [ खुश घर]

जीवन खिला चमन लगता है
घर तुझसे ही घर लगता है|
सोचों में हर पल खलता है
आशियाना असल लगता है|
ले मन में चाहत बस तेरी
जग थमा बेहतर लगता है| .
बादल घने चाँद भी गायब
मुरझाया अम्बर लगता है|
उस रब की मेहर लगता है
आसाँ हर सफर लगता है|
रेखा मोहन २३/११/१८

         

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