“चला हूँ मैं”…

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नफ़रत के बाज़ार में देखो मुहब्बत करने चला हूँ मैं ।
ख़्वाहिश के दरबार में देखो बगावत करने चला हूँ मैं ।
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आधुनिकीकरण लील गया है आज पारंपरिक खेलों को ,
बचपन के संसार में देखो शिक़ायत करने चला हूँ मैं ।
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मेरे आस-पास की विसंगतियाँ बढ़ती ही जा रही ,
कष्टों के आकार में देखो सलामत करने चला हूँ मैं ।
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मालूम है कि मैं हर किसी को सदा खुश नहीं रख सकता , तब भी ,
उल्फ़त के आधार में देखो हिफ़ाज़त करने चला हूँ मैं ।
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रिश्ते-नाते-अहसास सब कोरे पन्ने में सिमट रह गये ,
जनमत के सरकार में देखो तिज़ारत * करने चला हूँ मैं ।
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सभी ग़म को उड़ा दिया अब अपनी बेबाक हँसी में तो क्या ?
जीवन के मँझधार में देखो शरारत करने चला हूँ मैं ।
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ज़िस्म है बहुत दूर उधर , मगर रूह मेरे पास है “कृष्णा” ,
चाहत के इज़हार में देखो ख़ितावत * करने चला हूँ मैं ।
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* तिज़ारत = व्यापार
* ख़ितावत = एकाँत
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— °•K. S. PATEL•°
( 28/04/2018 )

         

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