चांद की शरारत

हर तरफ ही इश्क़ की कलियाँ खिला दी जायेगी |
चाँद तारो की शरारत कुछ मिटा दी जायेगी |

तुम कहो , तो चाँद – तारें आसमां से तोड़ दूँ |
गर नही तोडूं मेरी हस्ती मिटा दी जायेगी |

कब तलक मैं जान अपनी ही छुपाऊंगा कहीं |
इन हवाओं में मेरी भी जां उड़ा दी जायेगी |

होश तो तुम्हारे भी उड़ जायेगें साहब कभी |
नफ़रतों की ये दिवारें , जब गिरा दी जायेगी |

हौसलें कब के मेरे भी मर गये थे जिस्म में |
अब बदन के सारे जख्मों को दवा दी जायेगी |

होश संभाले भी संभलते नही हैं तब खुदा |
दर्द को हमदर्द दिल से जब मिला दी जायेगी |

कब तलक ये चाँद अपनी चांदनी दिखायेगा |
चांदनी ‘अरविन्द’ ले लो बस छुपा दी जायेगी |
❥ कुमार अरविन्द

         

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