चापलूसी के दाम मिला करते हैं

हुज़ूरों की ख़बर रखते थे अख़बार अब अख़बारों की ख़बर हुजूर लिया करते हैं
चापलूसी पे लोग हँसा करते थे कभी अच्छे दाम अब उसके भी मिला करते हैं

लैम्प पोस्ट की रोशनी में पढ़ाई करके भी नाम रौशन करते थे अधपेटे बच्चे
जो बेचते सारे शहर के लैंप पोस्ट वो अखबारों में पहले सफ़्हों पर छपा करते हैं

खुले आसमां के नीचे आंगन में कबूतर चुगा करते थे दाने गुटरगूं करके जहाँ
वहीं अब गोरैया भी चहकती नहीं है खिड़कियों पर काले शीशे लगा करते हैं

जो किसी के भी दलान पर गाँव में हर रोज लोगों की चौपाल सजा लेते थे
नामी अपार्टमेंट में बेटे के छोटे से कमरे की छत बस यूं ही निहारा करते हैं

जिन्हें डर ख़ुदा का है किसी से नहीं डरते ठोकरें खाकर गिरते हैं, संभलते हैं
ख़ुदयक़ीनी से हुनर को आजमाते और बिगड़ी क़िस्मत संवार लिया करते हैं

         

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