दिल में मेरे खून ए मुहब्बत

ग़ज़ल
जब दिल में मेरे खून ए मुहब्बत रखा गया,
हर इक क़दम पे जाम ए शहादत रखा गया।

दार ओ रसन पे दर्द के छींटे बहुत मिले,
प्यादे को जब वज़ीर ए रियासत रखा गया।

मुफ़लिस जहां से लौट के आता है ख़ाली हाथ,
उस अंजुमन का नाम अदालत रखा गया।

रुख पर गुलों के ख़ाक का उड़ना था लाज़मी,
जब पत्थरों को घर में सलामत रखा गया।

जब अश्क़ ए ग़म में डूब गई सारी क़ाएनात,
बर्बादियों का नाम मुहब्बत रखा गया।

ज़ख्मों में जाने कितने ही सूरज चमक उठे,
जब भी जुनूँ को बाइस ए ज़ुरअत रखा गया।

तब जा के संग ए दिल का धड़कना हुआ शुरू,
जब ला के इसमें दर्द ए क़यामत रखा गया।

सूरज, सितारे, चाँद ये बादल, फ़लक,  ज़मीं,
इन सब को सिर्फ़ इश्क़ की बाबत रखा गया।

सच्चाइयों में क्या है ये ‘साहिब’ न पूछिये,
साये में इसके तुख़्म ए बग़ावत रखा गया।
—-मिलन साहिब।

मुश्किल अल्फ़ाज़-
दार ओ रसन- फांसी और सूली,
मुफ़लिस- गरीब, अंजुमन- सभा,
रुख- चेहरा, गुल-फूल, ख़ाक़-राख/धूल, सलामत- सुरक्षित,
क़ाएनात- सृष्टि/संसार,
लाज़मी- जरूरी/आवश्यक, वजीर- मंत्री, बाइस- कारण, जुरअत- हिम्मत/दुस्साहस,
संगेदिल-पत्थर दिल,
फलक-आसमान,बाबत- वास्ते, तुख़्म ए बग़ावत- विद्रोह का बीज।

         

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