जिगर का ज़ख्म

जिगर का ज़ख़्म कुछ गहरा नहीं है
न जाने क्यों मगर भरता नहीं है
अंधेरे में जिसे मैं ढूंढता हूँ
उजाले में उसे देखा नहीं है
मिरी आँखें जो पढ़ना चाहती हैं
तिरे चेहरे पे वो लिक्खा नहीं है
मुहाफ़िज़ शहर के सब सो रहे हैं
गुनाहों पर कोई पहरा नहीं है
बहुत दिन से नज़र में है जो आज़र
अभी तक दिल में वो उतरा नहीं है

         

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