जिस्म तो मेरा फ़ना हो जाएगा

दर्द जिस दिन बावरा हो जाएगा l
रूह का पंछी हवा हो जाएगा ll

इक सुकूं की साँस ले लूँ आज तो,
कल नया मुद्दा खड़ा हो जाएगा l

क्यूँ चले आये हो यूँ ख़्वाबों में तुम,
ज़ख्म फिर दिल का हरा हो जाएगा l

एक सरगोशी सदा जिस दिन बनी,
बस उसी दिन फ़ैसला हो जाएगा l

सिर्फ़ तेरा साथ हो गर राह में,
हर सफ़र फिर खुशनुमा हो जाएगा l

ये भी होगा एक दिन, क्या थी ख़बर,
ग़म मेरा मुझसे बड़ा हो जाएगा l

रूह से मेरी मोहब्बत कीजिये,
जिस्म तो मेरा फ़ना हो जाएगा l

@ सुनील गुप्त ‘विचित्र’

         

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