तन्हाइयों में बैठ के ख़ुद से लड़ा करें

++ग़ज़ल ++(221 2121 1221 212 )
तन्हाइयों में बैठ के ख़ुद से लड़ा करें
मुमकिन नहीं फिर आप किसी का बुरा करें
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लम्हात चंद आपको मिलने ख़ुशी के हैं
जब भी नसीब हों इन्हे खुलकर जिया करें
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गर आपको समझना किसी ला-मकीं* का ग़म (*बेघर )
ख़ुद अपने घर से आप भी बेघर हुआ करें
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दुनिया से तीरगी को हटाना अगर हुज़ूर
ख़ुद आप क़ब्ल* शम’अ की सूरत जला करें (*पहले )
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यकतरफ़ा प्यार से कभी हासिल हुआ न कुछ
दोनों तरफ़ हो आग तभी सब वफ़ा करें
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तारीफ़ या तो मत करें करते किसी की गर
कंजूस मत बनें खुले दिल से किया करें
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ग़म से निज़ात चाहिए कुछ पल जनाब को
तो आईने में देख के ख़ुद पर हँसा करें
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ख़ुद से हमारा जब कि तआरुफ़ नहीं अभी
ग़ैरों के साथ अपना तआरुफ़ भी क्या करें
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सीखा ‘तुरंत’ आपने कहना अगर ग़ज़ल
दें और वक़्त यूँ न हवा में उड़ा करें
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी
20 /10 /2018

बह्र—मुजारिअ मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ मक़्फूफ़ महज़ूफ़
अरकान -मफ़ऊलु फ़ाइलातू मफ़ाईलु फ़ाइलुन

         

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