“तेरे शहर की आबोहवा “

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तेरे शहर की आबोहवा रास नही आती है आजकल,
ये जो आँखे है न ,खुद पर भरोसा नही करती है आजकल,

मेरे दोस्तों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है यारो ,
न जाने फिर भी दिल में उदासी क्यों रहती है आजकल,

कहते है लोग कि मैं बहुत खुश मिज़ाज हूँ ,
चेहरे पर ख़ुशी पल भर नही टिकती है आजकल ,

कमियां सब की देखकर होता बड़ा उदास ,
अपनी गलती सबको अच्छी लगती है आजकल ,

ऊँची ऊँची दीवारो के बीच दफन रहते है कई राज ,
छोटे घरो की चिंगारी ,सबको दिखती है आजकल,

अच्छी सूरत काला चश्मा , वाह क्या बात है ,
सुंदर वचन जुवान पर,दिल में कालिख़ पुती है आजकल,

उनके दौर की उन बातो को अब छोड़ भी दो “नीरज” ,
तेरे इस दौर में, हर पल कयामत होती है आजकल,

“नीरज सिंह “

         

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