दिन आ गए बहार के काकुल सँवारिये

++एक बेरदीफ़ ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 )
दिन आ गए बहार के काकुल* सँवारिये (*ज़ुल्फ़ें )
मौसम को ख़ुशगवार कुछ ऐसे बनाइये
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वैसे तो पहले वार से ये दिल है नीम जां*(*अधमरा )
बाक़ी है दिल में खूं अभी फिर तीर मारिये
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कितनों का क़त्ल कर चुका रुख़्सार पे जो तिल
जाएँ न और जान से इसको छुपाइये
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इक़रार-ए-प्यार की कोई सायत* चुनी है क्या (*मुहूर्त )
तारीख़ तय हुई कोई कुछ तो बताइये
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सजना सँवरना छोड़िये ज़ाया करें न वक़्त
सब ज़ेर-ए-इंतज़ार हैं महफ़िल में आइये
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अहसास हो कि मैं अभी ज़िंदा जहाँ में हूँ
फिर मेरा नाम आपके लब से पुकारिये
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मौजूद हैं बहुत यहाँ इंसान बद्नज़र
है लाज़िमी नज़र ज़रा ख़ुद की उतारिये
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ताबीर ख़्वाब की तभी होगी बुनोगे ख्वाब
चाहत हो जो भी आपकी सपने सजाइये
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नाराज़गी जनाब की वाज़िब नहीं ‘तुरंत’
ऐसे तो आप रूठ के हरगिज़ न जाइये
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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