पसीने को बहाने से सदा क़िस्मत सँवरती है

++ग़ज़ल++(१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ )
पसीने को बहाने से सदा क़िस्मत सँवरती है
चमक सोने की तपने से ज़ियादा ज्यों निखरती है
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जुनून-ओ जोश से लबरेज मंज़िल पर रखे नज़रें
उसी के घर में आ कर कामयाबी पानी भरती है
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दिये सबके बुझाती है महल हो या मकाँ-ए-फ़क़्र
अमीरी या ग़रीबी में हवा कब फ़र्क़ करती है
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अदब अख़लाक़ के हीरे जड़ा किरदार हो जिसका
महक उसकी हिना के जूं ज़माने में बिखरती है
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अँधेरे ग़म के जब छाते मुसीबत साथ में लाते
किसे मालूम है क्या क्या शबे-ग़म कर गुज़रती है
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हो जिसके हौसले ऊँचे न हो तकलीफ़ का कुछ डर
उसी की राह में अड़चन सदा आने से डरती है
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ज़रा सा बीज पड़ते ही यहाँ पौधे निकल आते
मुहब्बत वो ज़मीँ है जो कभी रहती न परती है
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रहे बढ़ता मुसल्सल कारवाँ-ए-आरज़ू-ए-दिल
यही देखा गया अक़्सर कभी हसरत न मरती है
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समर शाख़-ए-मरासिम पर लगेगें तब ‘तुरंत’ अच्छे
अगर कुछ सावधानी आपने रिश्तों में बरती है
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |
०३ /०६/२०१९
शब्दार्थ -मकाँ-ए-फ़क़्र =दरिद्रता युक्त घर
शबे-ग़म =दुःख की रात ,मुसल्सल=निरंतर
समर =फल ,शाख़-ए-मरासिम=रिश्तों की डाली

         

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