पहचान अपनी

हर एक ज़ख्म को पहचान मिल गई अपनी
शनाख्त तुझ को भी नादान मिल गई अपनी
मैं मुश्किलों का खिलाड़ी बहुत पुराना हूँ
कि ज़ीस्त तुझ को तो आसान मिल गई अपनी
उस आदमी पे भरोसा नही मुझे बिलकुल
ज़मीर बेच जिसे शान मिल गई अपनी
ये खार ज़ार से  रस्ते सफर सऊबत का
सितम ये राह भी सुनसान मिल गई अपनी
करीब देखा जो मंज़िल सुकूँ मिला दिल को
लगा कि जिस्म को अब जान मिल गई अपनी
वो आईना जो सदाक़त का पासदार रहा
उसे फरेब की दोकान मिल गई अपनी
कोई कसूर नही है किसी का भी इस में
जो ज़िंदगी ही परेशान मिल गई अपनी

अरशद साद रुदौलवी

         

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