निगाहें-कैफियत मिलनी चाहिए

मुझे सजा-ए -गैरत भी उतनी ही मिलनी चाहिए
जितनी देर मेरे ज़ख्म को पनाह मिलनी चाहिए

दिल मिलने में क्या पता सदियों लग जाएँ यहाँ
पहली मुलाक़ात में निगाहें-कैफियत मिलनी चाहिए

ये कुछ नए रस्मों-रिवाज़ों का शहर है,सम्भालिये
हाथ मिले न मिले लज्जते-बू जरूर मिलनी चाहिए

ये बच्चियाँ है इनकी ज़ानिब इतना तो हो जाए
इनके बदन को भी कुछ रियायत मिलनी चाहिए

बहुत नाच नचाया गया है इश्क़ को ज़माने ने
हुश्न को तो थोड़ी सिलसिले-आफत मिलनी चाहिए

सलिल सरोज

         

Share: