पड़े दिल में न ज़ंज़ीर कोई

++ग़ज़ल++(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )
पा* में डल जाये पड़े दिल में न ज़ंज़ीर कोई (*पैर )
रोके परवाज़-ए-मुहब्बत न जहाँगीर* कोई (*संसार का विजेता )
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कौन पाबंद करेगा यहाँ परवानों को
मानता कब है भला इश्क़ में तक़रीर कोई
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इश्क़ में किसको है फुर्सत जो लकीरें देखे
जो लिखे लिख दे भले कैसी भी तक़दीर कोई
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रूबरू आ ज़रा दीदार की हसरत है जवाँ
दिल को बहला न सकेगी तिरी तस्वीर कोई
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लाज़िमी* है कि कोई ख्वाब मुहब्बत का बुनो (*आवश्यक )
ख़्वाब के बिन तो कहाँ होती है ता’मीर* कोई (*निर्माण)
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इल्तज़ा है कि न मीज़ान* पे रक्खें उल्फ़त (*तराजू )
इश्क़ में करता न ग़लती से भी तन्ज़ीर* कोई (*फ़िज़ूलख़र्ची )
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छोड़ना होगा तसादुम* तो सुकूँ की ख़ातिर(*लड़ाई ,संघर्ष )
अम्न क़ायम तो न रख पाती है शमशीर* कोई (*तलवार )
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जब कभी मौका मिले साथ ख़ुशी से रह ले
हिज़्र को समझे न आशिक़ कभी ताज़ीर* कोई (*दंड)
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जी रहा है ये ‘तुरंत’ आज यही ख़्वाब लिए
इस जहाँ में न बचे एक भी दिलगीर* कोई (*दुःखी )
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
06 /06 /2018

         

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