“प्यास तो बढ़ती है”…

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चाहे शक़ हो या फिर जलन गलती है ।
दोनों सूरत में आग तो लगती है ।
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तलब गले का हो या फिर तमन्ना का ,
दोनों सूरत में प्यास तो बढ़ती है ।
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वक़्त खुशियों का हो या फिर कष्टों का ,
दोनों सूरत में रात तो ढलती है ।
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बर्ताव दिलों का हो या फिर मकान का ,
दोनों सूरत में भुले तो ढहती है ।
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बात यदि कर्म का हो या फिर धर्म का ,
दोनों सूरत में पाक तो फलती है ।
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धुआँ लकड़ी का हो या फिर यादों का ,
दोनों सूरत में आँख तो जलती है ।
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नारी-मन हो “कृष्णा” या फिर धरा-मन ,
दोनों सूरत में मार तो सहती है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 11/05/2018 )

         

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