प्रवासी मजदूर

इन तंग लिबासों को जो देख लजाया हूँ|
गुमनाम सी बस्ती से मैं शहर में आया हूँ |
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अपना मैं पता क्या दूँ पहिचान भी मेरी क्या,
है भीड़ वजूदों की बिछड़ा हुआ साया हूँ|
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हिस्से मेरे आया है जर्रा ये तरक्की का,
फुटपाथ पे ही अपना घरबार बसाया हूँ|
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सो जाओ मेरे बच्चो दुत्कार ही खा करके,
इन ऊँचे मकानों से इतना ही तो पाया हूँ|
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अब खौफ में मत रहना मेरे भी तू आने के,
काबिल जो नहीं तेरे मैं खुद शरमाया हूँ|
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आहट से मेरी आँखें रातों में नहीं खुलतीं,
ये शोर मशीनों का ख्वाबों में बसाया हूँ|
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क्यों नींद न आयेगी मजदूर ‘मनुज’ हूँ मैं,
ये जहर हवाओं से भरपेट जो खाया हूँ|

         

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