फिर शक्ल बदलने क्यों ग़ज़ल जाएगा

दिल को बहलाओगे तो बहल जाएगा
पर क्या इससे माहौल भी बदल जाएगा

जब लाशों से ही जलसा सजाया जाएगा
फिर शक्ल बदलने क्यों ग़ज़ल जाएगा

हर बात पर कोई न कोई घर जल जाएगा
फिर फरियाद सुनाने कौन महल जाएगा

ज़ख्म क्या पता कब नासूड़ हो जाएगा
पर प्यार से सहलाओगे तो सहल जाएगा

गर्म हवाओं से ये ज़मीन झुलस जाएगा
घरों में फिर बदहाल ही फसल जाएगा

नफरत का ज़हर ज्यों-ज्यों घुलता जाएगा
अपनी ही गर्दन काटता हर नस्ल जाएगा

सलिल सरोज

         

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