बदले में नफ़रत बशर क्या मोहब्बत पे आफ़त नहीं है

मिले नफ़रतों के जो बदले में नफ़रत बशर क्या मोहब्बत पे आफ़त नहीं है
दिमाग़ अपना ठंडा करें और सोचें अदावत का बदला अदावत नहीं है
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बनाया ख़ुदा ने गज़ब है बशर को मगर बख़्शी थोड़ी शराफ़त नहीं है
गढ़ा ख़ूबसूरत ये किरदार कितना शराफ़त बिना कोई क़ीमत नहीं है
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ख़ुदा ने दिया जो बदन ख़ूबसूरत जड़े मोती माणिक बहुत से क़बा* में(*लिबास )
हक़ीक़त में बेकार सब साज़-ओ-सामां अगर ज़िंदगी में मोहब्बत नहीं है
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मिला जो हुनर है तुझे लूटने का किसी का भी दिल और सुकूँ-चैन लेकिन
ग़लत फ़ायदा जो उठाया किसी ने बड़ी इससे दुनिया में लानत नहीं है
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सिमट अब गए हैं सभी रिश्ते-नाते निभाना इन्हें अब हुआ बोझ जैसे
मगरमच्छी आंसू बहाते सभी हैं बची अब कहीं भी रफ़ाक़त* नहीं है (*दोस्ती )
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किसी पर है गुस्सा किसी पर निकाले पुरानी रही है बशर की ये फ़ितरत
हमेशा इनायत ख़ुदा की रही है क़सम से हमारी ये आदत नहीं है
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ख़ुशी और रफ़ाहत* के लम्हात जब भी मिलें ज़िंदगी में इन्हें सब समेटें (*चैन )
ग़मों और आफ़त के दिन भूल जाएँ कभी याद रक्खें ज़रूरत नहीं है
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भले दूरियाँ हों सितारों के जितनी सभी नाप लेंगे मोहब्बत से इक दिन
समुन्दर नदी को समाना जो भूले समुन्दर की ऐसी भी फ़ितरत नहीं है
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बनाये बहुत हैं महल ऊँचे ऊँचे भले जोड़ ली है जहाँ भर की दौलत
‘तुरंत’ असली दौलत तो इल्म-ओ-अदब की बिना जिसके कोई भी इज़्ज़त नहीं है
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
21 /10 /2018
* बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम 16 रुकनी
अरकान -(फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन)
(122 122 122 122 122 122 122 122 )

         

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