वो अहबाब नहीं आते

++ग़ज़ल++(२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २ )
बिन पूछे आया करते जो वो अहबाब नहीं आते
मेहमाँ बन के भी रातों को तेरे ख्वाब नहीं आते
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रुख़्सत हुए परिंदे जब से जानां तेरी यादों के
दिल का दरिया ठहर गया उसमें सैलाब नहीं आते
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जब से बढ़ी शनासाई है कुछ तो आलम बदला है
तेरे कूचे से हमदम अब हम बेआब नहीं आते
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महँगाई मज़बूर करे, सब इश्क़ भुला देता दफ़्तर
साथ साथ रहने को दिन में अब सुर्खाब नहीं आते
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ये नैमत बख्शी है रब ने झोंपड़ पट्टी वालों को
आज अमीरों की छत पर तारे महताब नहीं आते
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बिकना शुरू हुआ है जब से पानी,हमको आज नज़र-
प्याऊ ,पोखर , कुंड, बावड़ी और तालाब नहीं आते
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कठिनाई, आफ़ात, मुसीबत, दर्द-ओ-ग़म का भी सहरा
जीवन में किसके बोलो ऐसे गिरदाब नहीं आते
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भूल मयानी गए इश्क़ के यार जिस्म से प्यार तुम्हें
माशूक़ा के घर लेकर वरना तेज़ाब नहीं आते
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ऐसे लोगों में बँटते देखा है लक़ब-ओ-शाल ‘तुरंत’
जिन लोगों को ठीक तरह अदब-ओ-आदाब नहीं आते
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
***29 /03 /2018 ***
अहबाब=दोस्त ,सुर्खाब=चकवा पक्षी( जिनके बारे में मशहूर है
ये दिन में मिलते है रात को बिछड़ जाते हैं | )
गिरदाब=भंवर ,लक़ब=उपाधि ,अदब-ओ-आदाब=साहित्य और
शिष्टाचार |

         

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