“बेटियाँ”…

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बेटी हर पल सक़ून से जीने का अंदाज़ है ।
चेहरे पर मुस्कान बिखेर देने वाली आज़ है ।
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तरस आता है जो बेटियों का मोल न समझते ,
कभी न कभी उन पर गिरता वक़्त का ग़ाज़ है ।
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इस ज़हान में ख़ूबसूरत छटाओं को देख लो ,
सभी में छुपा बेटियों के हँसने का राज़ है ।
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सूने आँगन में तरन्नुम की एक लहर जगाती ,
सबके जीवन का एक मधुरतम साज़ है ।
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ज़हान में जब एक कली खिलती है बेटी की ,
तो क़ुदरत भी बहुत करता उस पर नाज़ है ।
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अग़र बेटा को राज़कुमार मानते हैं ”कृष्णा”,
तो बेटी हर माँ-बाप के लिये सरताज़ है ।
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