“भिखारी”…

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फटे कपड़ों से शरीर को छुपाता दिखता है भिखारी ।
दुखों के सागर आँखों से बहाता दिखता है भिखारी ।
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कभी सड़कों पर , कभी बाज़ारों , कभी सभी दुकानों पर ,
देह-मन के वास्ते हाथ फैलाता दिखता है भिखारी ।
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पेट और पीठ मिलकर जब कभी सवाल दागते हैं तब ,
मुड़ी-सी लाठी को ज़वाब सुनाता दिखता है भिखारी ।
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फटी-पुरानी झोली से बटोरी अनाज गिर जाती है ,
तब अन्न के सब दानों को उठाता दिखता है भिखारी ।
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मुट्ठी भर दानों के बदले जब कहीं गाली मिलती तो ,
अपने भाग्य को ही कोसकर जाता दिखता है भिखारी ।
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घर की परिभाषा ये क्या कहे , बिल्कुल भी नहीं जानता ,
घास-फूस से अपना महल बनाता दिखता है भिखारी ।
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ज़िंदगी की तमाम विषमताओं की क्या बात करें “कृष्णा”,
इस घुटन भरी ज़िंदगी से घबराता दिखता है भिखारी ।
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