हमक़दम, हमसफ़र मेरा रहनुमा कोई और है

|||==ग़ज़ल==||| ( 11212*4 )
मेरा हमक़दम मेरा हमसफ़र मेरा रहनुमा कोई और है
सभी कश्तियाँ किसी और की, मेरा नाखुदा कोई और है
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चले कायनात का ये सफ़ऱ तेरे हाथ में नहीं डोर भी
है ये उँगलियाँ किसी और की यहाँ नाचता कोई और है
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मेरी ज़ीस्त में है बचा ही क्या नहीं साथ तेरा मिले अगर
मुझे देर से ये पता चला तेरा हमनवा कोई और है
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ये सुरूर अब जो नशे का है चढ़ा आज हर नौ जवान पर
इसे छोड़ देने में है भला सही रास्ता कोई और है
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हमें ये ख़बर थी के शह्र में कई लोग आज है ग़मज़दा
कभी दहशतें कभी वहशतें कभी माजरा कोई और है
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कभी ख़ुदकशी का ख़याल भी नहीं आ सके तेरे क़ल्ब में
जरा कुछ ठहर के ये सोचना , राह देखता कोई और है
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कभी गौर कर के भी देखिये नहीं कम सजा से है मुफ़्लिसी
यहाँ रोज खटता ग़रीब है मज़े लूटता कोई और है
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रहा घूमता मैं इधर उधर किसी सिलसिले की तलाश में
बड़ी ख़ाक छानी तो जो मिला ये भी सिलसिला कोई और है
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |

         

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