मेरी मां

बोझ कितना उठा रही है मां।
हम को जीना सिखा रही है मां।

आज फिर से चमक है आंखों में
आज चुल्हा जला रही है मां।

आज मैं पेट भर के खाऊंगा
आज रोटी पका रही है मां।

जख्म कितने बदन पे झेले हैं
दर्द फिर भी छुपा रही है मां।

आज उपवास है मेरा बच्चों
झूठ हम को बता रही है मां।

रोज लड़ती है भूख से लेकिन
भूख मेरी मिटा रही है मां।

कैसे कह दूं गरीब हूं अंशू

मुझ पे दुनिया लुटा रही है मां।

अंशु

         

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