“मौसम बदल रहा है”…

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बड़ा अज़ीब आज-कल यहाँ पर मौसम बदल रहा है ।
सच है चुपचाप औ झूठ बड़े शान से चल रहा है ।
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कलियुग का दानव मानो रच-बस गया है ज़ेहन में ,
तभी तो गलत कामों के लिए ही जी मचल रहा है ।
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अपना कौन-ग़ैर कौन , यहाँ अब पहचानना मुश्किल ,
ख़ास का नक़ाब लगा कोई बेहिसाब छल रहा है ।
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ग़मे-मोहब्बत ज़िंदगी में दूर हो गया है अब तो ,
ग़मे-ज़माना ही दखल दे इंसां को मसल रहा है ।
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सेहत से लापरवाही बरतने का नतीज़ा इधर ,
दवाख़ाना में असावधानी का हिसाब निकल रहा है ।
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मौसम की अपार तपिश बर्दाश्त ज़रूर हो जाएगी ,
पर क्या करें उसका जो हर तरफ़ माहौल जल रहा है ?
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पीढ़ियों का अंतर रिश्तों की बलि न ले-ले सोचकर ,
सही बंदा “कृष्णा” मौके के अनुसार ढल रहा है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 10/06/2018 )

         

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