ये कैसी ख्वाहिश की मैंने इश्क़ की

ये कैसी ख्वाहिश की मैंने इश्क़ की
जिसे चाहा वही खंज़र भी है कातिल भी ।।1।।

हो तो कैसे यकीन इस दुनियादारी की
हर मंज़र आज दरयाफ्त भी है फ़ाज़िल भी ।।2।।

नशा भी गया उस चाँद के मयारी की
जो नींद की चोरी में गवाह भी है शामिल भी ।।3।।

इस्तकबाल हो जरुर ऐसी एय्यारी की
जो इस बाज़ीगरी में किश्त भी है कामिल भी ।।4।।

क्या रंग खिला है हुकूमत के यारी की
जो बाज़ार में खुद इल्तिज़ा भी है तामील भी ।।5।।

सलिल सरोज

         

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