रदीफ –हिचकियाँ आई

जब कभी प्रीतम तुमको सोचू शरमाई
हिचकियों से बढ़ जाती दिल की तन्हाई.
हर समय ना बोलूँ सबको यूँ अफसाने
समझ सह पाना मुश्किल सा ये रुसवाई.
बहुत साल ताना सहा है खुद में कुढ़ कर
अब कहीं मार ही डालेंगी जाना कड़ाई.
दखल करें जब भी रोकू मगर घबराई
बात तनिक सभले से हमने कुछ हटाई.
बेखबर ज़ालिम तू क्यों सोचें जम्हाई
प्रभु अदालत में सबकी होगी सुनबाई.
स्वरचित रेखा मोहन
11/7/18

         

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