लिखना है…

जो कुछ भी है जितना है
मुझ को काफ़ी उतना है

यारों का दिल जीत सकूँ
ख़्वाब मेरा बस इतना है

आँखें सागर से पूछें
तुझ में पानी कितना है

आग लगाकर है हँसती
कैसी ज़ालिम दुनिया है

लिखने पर पाबंदी है
‘दीप’ मुझे तो लिखना है

भरत दीप
29.06.18

         

Share: