ले के चलते हैं

 

जहाँ होता दिलों में प्यार वो फ़र ले के चलते हैं
अना वाले तो हाथों में भी पत्थर ले के चलते हैं

न जाने क्यों मुहब्बत को करा नीलाम सब ने ही
कहाँ अब लोग उल्फत में फ़्लावर ले के चलते हैं

नई तहज़ीब देखी है बदलते वक़्त में हमने
वो अपनी छोड ग़ैरो की ज़मीं ज़र ले के चलते हैं

भला किस ने ये जाना है घड़ी अंतिम वो कब होगी
जिगर वाले कफ़न अपना तो अक्सर ले के चलते हैं

किसी सैनिक से पूछो तो कभी तुम एक दिन जा कर
सुनहरे पल क़ज़ा के ‘भवि ‘वो सर पर ले के चलते हैं

फ़र – रौशनाई
फ़्लावर – फूल
(Flower)
ज़मीं ज़र-जायदाद

शुचि ‘भवि’

         

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