लफ़्ज़ मेरे बस सुखन को दी शहादत मानिये

++ग़ज़ल++(2122 2122 2122 212 )
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लफ़्ज़ मेरे बस सुखन को दी शहादत मानिये
शायरी को भी महज़ हर्फ़-ए-अकीदत मानिये
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हो भले जज़्बात दिल के पेश करने का हुनर
हर ग़ज़ल मेरे लिए होती इबादत मानिये
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गीत में करता किसी का जिक़्र यारों इस तरह
जो पढ़े समझे यही उसकी मुहब्बत मानिये
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छंद में बसती है सचमुच रूह मेरी दोस्तों
देख कर रुसवा उसे होता हूँ आहत मानिये
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एक वादा आपसे सच ही कहेगा ये क़लम
ज़िंदगी पे भी भले होती हो आफ़त मानिये
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मानता हूँ पड़ गया सच्चे सुखनवर का अकाल
पर नए तैयार भी होते ग़नीमत मानिये
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बेबह्र लिखते हैं उनसे इक ज़रा सी इल्तिजा
बाबह्र होने में मिलता लुत्फ़-ओ-लज़्ज़त मानिये
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रास्ते भी आजकल देखे नए खुलते हुए
दे किताब-ए-रुख़ क़लम को कुछ तो राहत मानिये
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और भी अशआर बेहतर कल कहेगा ये ‘तुरंत’
दाद से मिलती क़लम को ख़ूब ताक़त मानिये
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी .
08 / 04 /2018
शब्दार्थ – हर्फ़-ए-अकीदत=श्रद्धायुक्त अक्षर
किताब-ए-रुख़=फेसबुक

         

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