वो गिरे इतने न थे

आदमी के कारवां में भेड़िये इतने न थे|
काटते पहले भी थे पर नोंचते इतने न थे|
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वहशियेपन की भी हद है जो दफा कम पड़ रही,
जुर्म तो तब भी थे लेकिन वो गिरे इतने न थे|
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वो नजर रखते थे तब भी, थे निगेहबां लोग पर,
कौन क्या निकला पहनकर देखते इतने न थे|
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रास्ते कच्चे थे उनपर धूल उड़ती थी बहुत,
मन्द थी रफ्तार लेकिन हादसे इतने न थे|
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रंग भी था रूप भी था और चैहरा एक था,
लोग थे ऐसे ही लेकिन दोगले इतने न थे|
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निभ रही जैसे अदावत बैठकर पहलू में अब,
दूर रहकर तब दिलों के फासले इतने न थे|
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उम्र का शायद असर है जो “मनुज”अब ढल रही,
वरना पहले दौड़कर हम खाँसते इतने न थे||

         

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