वो तो हँसी-ठिठोली को ही तरीफां समझ बैठी

वो भीड़ को शोहरत का तकाज़ा समझ बैठी
अपनी ग़ज़लों में उन्स को वज़ा समझ बैठी

थोड़ा वक़्त,थोड़ा शमा,थोड़ा जुनूँ भी चाहिए
वो नज़्म को यूँ बच्चों का खिलौना समझ बैठी

तौर-तरीके भी होते हैं हर्फ़ की राज़दारी में
वो शेर को मसलन बस लतीफा समझ बैठी

हैं फेरहिस्त में और भी सुखनबार इस मर्ज़ के
वो बेवजह ही खुद को क्यों खलीफा समझ बैठी

कुछ लिखने से पहले कुछ सीखना भी होता है
वो तो हँसी-ठिठोली को ही तरीफां समझ बैठी

सलिल सरोज

         

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