वो सियासत के लिए हालात करते आतशीं

++ग़ज़ल++(२१२२ २१२२ २१२२ २१२ )
वो सियासत के लिए हालात करते आतशीं
दाँव पर लगते जुबाँ या जात मजहब और दीं
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बेगुनाहों का हो खूं मरती अगर इंसानियत
कैसे कर सकता कोई इंसां कलेजा आह्नीं
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ज़िंदगी जिनकी है मानिंद-ए-सराय-ओ-मयक़दा
फिर बताओ किस तरह वो लोग बन जाएँ मकीं
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ये मकाँ खाली है दिल का जानते हो क्या सबब
जाल में फ़ँसकर रक़ीबों के न लौटी नाज़नीं
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बागबाँ जब ख़ुद उजाड़े हाथ से अपना चमन
अश्क कलियाँ पोंछ लें फिर कौन सी हो आस्तीं
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चंद लोगों ने बना डाला जहन्नुम अब उसे
जो हुआ करता कभी फ़िरदोष दुनिया में हसीं
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खोदता ही जा रहा इन्सान धरती की लहद
इसलिए मौसम ज़ियादा हो गया है आतशीं
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क्यों हिजाबों का चलन है सिर्फ औरत के लिए
आईने के रू ब रू हो रो पड़ी पर्दानशीं
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इश्क़ की गर्मी का आलम इस तरह होता ‘तुरंत ‘
चाँद की भी चाँदनी में फिर मिले ठंडक नहीं
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी
२५/०३/२०१८
शब्दार्थ– आतशीं =आग लगाने वाले ,
दीं =दीन (पन्थ )आह्नीं=लोहे का ,
फ़िरदोष=स्वर्ग ,लहद =क़ब्र ,

         

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