वक़्त सबका ही तो बदलता है

2122 1212 22

पाप बनकर वही निकलता है
ऐब ज़ेहनों में जितना पलता है

आसमानी हमारे रिश्ते में
ये ज़मीं वाला अक्स खलता है

जिसने चींटी कभी नहीं मारी
क़त्ल का उसपे केस चलता है

थक गए शब्द दरमियाँ के जब
मौन बेबस वहाँ पे पलता है

ग़म मिला आज कल ख़ुशी होगी
वक़्त सबका ही तो बदलता है

झूठ देखो फ़रेब से कैसे
आज बचपन को ‘भवि’ निगलता है

शुचि ‘भवि’

         

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