“शबे-माहताब ऐसा भी”…

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काँटों के संग मुस्कुराता , इक गुलाब ऐसा भी ।
सवाल में ही नज़र आ गया , इक ज़वाब ऐसा भी ।
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निगाहें ताड़ लेती हैं मुहब्बत की अदाओं को ,
छुपा पाया न ये कभी , इक तहे-नक़ाब * ऐसा भी ।
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ज़ेहन में किसी को महफ़ूज रखना आसान कहाँ ?
पल-पल अंजाना-डर , इक इज़तराब * ऐसा भी ।
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कोई क़सूर नहीं यहाँ इन बेचारे आँखों का ,
दिल टूटने से निकल पड़ता , इक सैलाब ऐसा भी ।
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रस्मे-जहां * न छूट सकी इधर तर्के-इश्क़ * से मगर ,
बेवज़ह चर्चा होता रहता , इक खराब ऐसा भी ।
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दूसरों की सब गलती अच्छे से याद रहती है ,
अपना हमेशा भूल जाते , इक हिसाब ऐसा भी ।
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क्या जलवा कि अपनी भी कोई ख़बर नहीं है वहाँ ,
मदहोशी मय बिना , इक शबे-माहताब * ऐसा भी ।
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चार दिन की ज़िंदगी , समझकर ज़रूरी है बिताना ,
न जाने ये कब फूट जाये , इक हबाब * ऐसा भी ।
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शराफ़त की भी कोई हद तो देख लो ऐ “कृष्णा” ,
कुछ भी नहीं कर पाए उसको , इक ख़्वाब ऐसा भी ।
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* तहे-नक़ाब = पर्दे के पीछे
* इज़तराब = बैचेनी
* रस्मे-जहां = दुनिया के रीति-रिवाज
* तर्के-इश्क़ = प्रीत का त्याग
* शबे-माहताब = चाँदनी रात
* हबाब = बुलबुला
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— °•K.S. PATEL•°
( 12/11/2018 )

         

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