“शहर में”…

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2122 212 2122 212
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आजकल क्या हो रहा है सियासत शहर में ।
जिधर देखो नज़र आता बग़ावत शहर में ।
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मुहब्बत के खेल में पैर रखना समझकर ,
इश्क़ की है जानलेवा शरारत शहर में ।
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दूसरों को लूट लेते इधर तो ग़म नहीं ,
ख़ुद लुटे तो फिर हजारों शिक़ायत शहर में ।
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ग़र भटकता कदम कोई शख़्स रोके ज़रा ,
फिर यक़ीनन वो रहेगा सलामत शहर में ।
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सफलता कैसे नहीं पास होगा जान लो ,
मेहनत करके ज़रा बदल आदत शहर में ।
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रात-दिन बस भागता जा रहा है आदमी ,
क्या कहें , कब ख़तम होगा मुसाफ़त * शहर में ।
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ये ज़िस्म में जान जब तलक “कृष्णा” है यहाँ ,
सोचना भी मत मिलेगा ज़मानत शहर में ।
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* मुसाफ़त = यात्रा
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