सताया ख़ूब कई बार मुश्किलों ने मुझे

+++ग़ज़ल ++(1212 1122 1212 22 /112 )
सताया ख़ूब कई बार मुश्किलों ने मुझे
ग़मों के हादिसों ज़ख़्मों के सिलसिलों ने मुझे
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गुनाह बोलने का सच किया इसी ख़ातिर
किया है रुसवा लगातार महफ़िलों ने मुझे
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अकेला था तो कोई ख़ौफ़ कोई फ़िक़्र न थी
कि फ़िक़्रमंद किया है तो काफ़िलों ने मुझे
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जो एक बार लिया ठान दम लिया पाकर
अगरचे खूब किया तंग मंज़िलों ने मुझे
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सबक़ सिखा के गए जिनको समझा था जाहिल
मगर निराश किया ख़ूब क़ाबिलों ने मुझे
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जिन्हे समझ लिया था शेर छुप के बैठे हैं
दिया है डाल तअज्जुब में बुजदिलों ने मुझे
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यक़ीन जिनपे था वो आज बन गए दुश्मन
हयात बख्श मिरी दी है क़ातिलों ने मुझे
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अलम उठाये जो सच का फ़रेब में शामिल
कि सच से रूबरू करवाया बातिलों ने मुझे
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‘तुरंत’ देखा है मैंने अजीब इक मंज़र
ख़ुशी की राह दिखाई है बेदिलों ने मुझे
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
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शब्दार्थ-जाहिल =अनपढ़ ,तअज्जुब =आश्चर्य
हयात=जिंदगी , अलम=झंडा , बातिलों=झूठों
बेदिलों=उदास लोग

         

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