सन्नाटे में पूरा शहर

रात  थी सदमें  में है  जल  रही  दोपहर
समंदर ख़ामोश है दिल में उठती लहर

थका ही  देंगें  बोझिल  हुए ये पाँव तेरे
छांव में पीपल की  सांस ले ज़रा ठहर

ख़ुद ही सीने होगे जख़्म अपने तुम्हें
सन्नाटे में है सोया  हुआ  सारा शहर

घायल तुम हो रहे हो जिसके वार से
देखना ग़ोर से ज़ाली न  हो वो  नज़र

मुस्कुराते होंट उसके अब दिखने लगे
पा गया  मंज़िल  अब पूरा हुआ सफर

होगा नही कुछ घर  जा साथ खाने से
उनके जख़्म सहला तभी होगा असर

हक़ीकत सबको नंगी आंख दिखती है
अखबार में छपती कहाँ असली ख़बर

         

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