“सिसकता किसान”…

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जीवन में आया ये किस तरह का अनुचित व्यवधान है ?
चारों तरफ दिख रहा चुपचाप सिसकता हर किसान है ।
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अपनी अनवरत मेहनत से हर किसी का पेट भरता ,
मगर अन्नदाता का पूरा न हो पाता अरमान है ।
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कभी मौसम तो कभी झूठे वादों का दर्द झेलता ,
इक आस के भरोसे मानो पल रहा ये नादान है ।
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कभी बाढ़ ने तो कभी सूखे ने बहुत अधिक सताया ,
आज ज़िंदगी कैसे चलेगी , हर बात से ये अंजान है ।
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हर सपना है अधूरा , कर्जा में डूब गया है पूरा ,
भर-भर कर ये आहें और कितना बड़ा नुकसान है ?
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दर्द का भार झेलता देखकर अपना ज़मीन बंजर ,
मसीहा मेहनत का मगर रहता ज्यादा परेशान है ।
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विडम्बना है कि छप्पर से पानी की बूँदें टपकती ,
फिर भी बारिश की दुआ में राह देखता आसमान है ।
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ये आज सोचने पे मज़बूर , हल से क्या हल होगा ?
बैल भी इसका , अब जाऊँ कहाँ , सोचकर हैरान है ।
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अस्तित्व किसानों का मानो मिटने को आतुर “कृष्णा”,
न जाने बीतने को बचा और कितना इम्तिहान है ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 27/04/2019 )

         

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